चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।
श्री हरिवंश राय ‘बच्चन’ जी की इन अमूल्य और अतुल्य शब्दों के भावार्थ आज सत्य से प्रतीत हो रहे हैं| मुख्यतः मेरी परिस्तिथि पर| मैं निराशावादी नहीं हूँ| उल्टा अगर मेरी गिनती निराशावादीयों की श्रेणी में हो तो मैं उससे दुर्भाग्यपूर्ण घटना, अपने पूरे जीवन की, किसी और को नहीं मानूंगा| मेरा आज तक सिर्फ आशा की किरणों ने ही मार्ग दर्शन किया है| मैं आशावादी हूँ| मेरा मानना है कि, भविष्य सुन्दर है…भविष्य उज्जवल है…सिर्फ मेरा ही नहीं…समस्त पृथ्वी का| स्वाभाविक है कि अब आपका प्रश्न होगा कि फिर मैं निराशावादी क्यूँ प्रतीत हो रहा हूँ? उत्तर भी सरल है …एकाग्रित हो कर उपरोक्त पंक्तियों को दुबारा पढ़ें …उनमे निराशावाद से अधिक असमंजस है…भ्रान्ति है| मैं निराश नहीं हुआ अभी…पर हाँ, किंकर्तव्यविमूढ़ अवश्य हूँ| परिस्तिथियाँ ही कुछ ऐसी हैं, किन्तु परिस्तिथियों के विषय पर कभी और वार्तालाप करेंगे|
आज इस स्तिथि ”किंकर्तव्यविमूढ़” के विषय में विचार विमर्श हो जाये?
किंकर्तव्यविमूढ़ता, साधारणतः एक अल्पजीवी अवस्था है| एक ऐसी अवस्था जिसमे आप अपनी सोचने, समझने और समस्या का समाधान निकालने में असक्षम हो जाते हैं| जब आपकी बुद्धिमत्ता पर अन्धकार कि एक चादर डल जाती है और आपको ऐसा प्रतीत होता है कि आप एक महासागर के मध्य में बिना किसी साधन के, बिना किसी मदद के, खड़े हैं| कुछ परिस्तिथियों में ऐसी अवस्था लाभ दायक भी साबित होती है, किन्तु अधिकांश तौर पे यह अवस्था बहुत हानिकारक होती है| क्या करें? क्या न करें?…ये प्रश्न बहुत ही विचलित करते हैं| तो इस अवस्था से निकालने का उपाय क्या है? साधारण मनुष्य जैसे कि मैं और आप ऐसी अवस्था में क्या करें?
मेरा मानना है कि मुझमें, आपमें और हम सब में एक असीम उर्जा का प्रवाह होता है…शारीरिक या भौतिक उर्जा नहीं … किन्तु मानसिक उर्जा| मेरा यह भी मानना है कि मुझमे इस उर्जा का प्रवाह, असाधारण नहीं किन्तु पर्याप्त मात्रा में अवश्य होता है| मुझसे जब भी मेरी इस अविरल ऊर्जा स्त्रोत के विषय पर प्रश्न किया जाता है तो मेरे पास सिर्फ एक ही उत्तर होता है, और वो ये कि – हमारी मानसिकता, न की हमारी मानसिक स्तिथि, उस उर्जा का स्त्रोत है| अब आप इस विषय पर किंकर्तव्यविमूढ़ होंगे कि मानसिक उर्जा क्या है और इस चर्चा से उसका का क्या सम्बन्ध? सम्बन्ध यह है कि इस मानसिक उर्जा का प्रभाव आपकी मानसिक स्तिथि पर एक गंभीर रूप से उद्धारित होता है| यदि आपकी मानसिक उर्जा सही मात्रा में प्रवाहित होती है तो आपकी मानसिकता आपकी मानसिक स्तिथि को अधिकृत करने में सक्षम हो जाएगी| अब आपकी मानसिकता और आपकी उर्जा, दोनों ही दो प्रकार के हो सकते हैं – सकारात्मक या ऋणात्मक| यदि आपकी मानसिकता सकारात्मक है तो निःसंदेह आपकी उर्जा भी सकारात्मक होगी और ऐसा होने पर भले ही कैसी भी परिस्तिथि हो, कुछ क्षणों के लिए आप अवश्य अपना संतुलन खो देंगे, अवश्य ही निराश या नकारात्मक हो जायेंगे…किन्तु यह स्तिथि अल्पजीवी होगी…आप तीव्रता से अपने आप का संतुलन वापस पाने में सक्षम रहेंगे…एक आशा कि किरण आपमें वो पुरानी स्फूर्ति ला देगी जिससे आप अच्छी तरह अवगत हैं| उदाहरण के तौर पे – एक ऐसे दिन का ध्यान करिए जिसका आरम्भ किसी अच्छे समाचार या सन्देश से हुआ था…अवश्य ही वह आपका पूरा दिन सुखमय व प्रफुल्लित व्यतीत हुआ होगा? निष्कर्ष स्पष्ट होना चाहिए कि हमें एकमात्र सकारात्मक विचारों और परिणामों का ध्यान करना चाहिए| केवल सुविचारों के प्रवाह को प्रोत्साहित करना चाहिए| और इसके विपरीत स्तिथि वाले दिवस का भी एक बार ध्यान करिए जिस दिन आपको कोई बुरा समाचार या सन्देश मिला हो…वह दिन कैसा व्यतीत हुआ था? मैं ऋणात्मक उर्जा और मानसिकता के विषय में विस्तार से वार्तालाप नहीं करना चाहता क्यूंकि ऐसी विचारधारा पे समय व्यर्थ करना मैं उचित नहीं समझता| सद और असद विद्या, दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है, पर मेरी समझ से आप सब इस “असद” विद्या से बोधित अवश्य होंगे| इसी कारणवश मैं नकारात्मक मानसिकता और उर्जा पर मैं अपनी उर्जा और समय व्यर्थ नहीं करना चाहता| एक वाक्य में – ऋणात्मक विचारधारा और मानसिकता से जितनी दूरी रखिये उतना ही लाभदायक होगा|
एक बार जब विचारधारा पर आपका नियंत्रण हो जाये, उसके बाद का कार्य अति सरल हो जाता है| उसके बाद आपको सिर्फ एक ओर बढ़ना होता है…सिर्फ निर्णय लिए ही कार्य करने होते हैं| ध्यान रहे कि बढ़ने से पहले या कार्य करने से पहले आप फिर उसी विचलित अवस्था में न चले जाएँ…कि इस ओर बढे तो क्या होगा? ये कार्य किया तो क्या होगा? यदि हमने जैसा सोचा है वैसा नहीं हुआ तो? ऐसे विचार कृपा कर के अपने मस्तिष्क में न लाये..ये मेरा अति विनम्र और अटल अनुग्रह है आपसे| हम में से कोई भी भविष्य नहीं जानता| यदि हम इसी विचार में रहे कि हमारे किस कार्य का क्या परिणाम होगा, हम अपना जीवन उसी विचार में व्यतीत कर देंगे और हमें कभी जानकारी नहीं होगी कि उस कार्य का असल जीवन में क्या परिणाम होता? कार्य कर के तो देखो आप, कि परिणाम क्या होता है? अन्यथा आपको वो ज्ञान कैसे होगा? बिना कार्य किये या बिना निर्णय लिए ही आप कैसे जान जाओगे परिणाम? दूसरों कि ओर ना देखो, दूसरों कि परिस्तिथियों से तुलना ना करो| कृपा करता हूँ…आग्रह करता हूँ| दूसरों कि भूल से सीख लेना अच्छी बात है, किन्तु हर किसी कि परिस्तिथि एक नहीं होती, हर व्यक्ति कि क्षमताएं एक नहीं होती…इसलिए यदि किसी और ने आपके समान कोई परिस्तिथि में कोई निर्णय लिया और वह निर्णय या कार्य उसे भरी पड़ा तो आवश्यक नहीं है कि वाही कार्य या निर्णय आपके लिए भी भरी पड़ेगा| आप कार्य कर के तो देखो, निर्णय ले कर तो देखो…यदा कदा में न रहो…जीवन में इतने सारे यदा कदा हैं कि उन सबका उत्तर स्वयं इश्वर के पास नहीं होगा| कार्य करो, फल कि भी इच्छा करो, किन्तु फल कि इच्छा में कार्य न करो, ये तो उचित नहीं है| एक छोटे से शिशु का ही उदाहरण लो…यदि उसे यह ज्ञान होता कि जब वह अपने पहले पग उठाएगा तो अवश्य ही गिरेगा और उसे चोट लगेगी तो क्या कोई भी शिशु कभी भी चल पाता?
‘मधुशाला’ कि जिन पंक्तियों से मैंने इस चर्चा का प्रारंभ किया था, उनसे ही अंत भी करना चाहूँगा…और शायद श्री बच्चन जी कि उन अगली पंक्तियों से आपको मेरे चर्चा का सन्दर्भ भी समझ आये …
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’। ६।
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’। ६।
चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।
मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।
धन्यवाद|
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